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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
त्वां च मूढाकृतप्रज्ञमतिमानिनमाहवे |  १७   क
दृष्ट्वा दुर्योधनो मन्दो भृशं तप्स्यति पातितम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति