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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनेन प्रतिज्ञाते वधे कर्णसुतस्य तु |  १८   क
महान्सुतुमुलः शव्दो वभूव रथिनां तदा ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति