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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या सम्पादिता जिष्णो प्रतिज्ञा महती त्वय़ा |  २१   क
दिष्ट्या च निहतः पापो वृद्धक्षत्रः सहात्मजः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति