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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
न तं पश्यामि लोकेषु चिन्तय़न्पुरुषं क्वचित् |  २३   क
त्वदृते पुरुषव्याघ्र य एतद्योधय़ेद्वलम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति