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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
तवैव भारो वार्ष्णेय़ तवैव विजय़ः प्रभो |  २९   क
वर्धनीय़ास्तव वय़ं प्रेष्याश्च मधुसूदन ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति