शान्ति पर्व  अध्याय २७५

नारद उवाच

उरसेव प्रणमसे वाहुभ्यां तरसीव च |  ३   क
सम्प्रहृष्टमना नित्यं विशोक इव लक्ष्यसे ||  ३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति