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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
इति मामव्रवीत्कर्णः पश्यतस्ते धनञ्जय़ |  ४   क
एवं वक्ता च मे वध्यस्तेन चोक्तोऽस्मि भारत ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति