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वन पर्व
अध्याय ८१
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पुलस्त्य उवाच
ततः कन्याश्रमं गच्छेन्निय़तो व्रह्मचर्यवान् |  १६५   क
त्रिरात्रोपोषितो राजन्नुपवासपराय़णः |  १६५   ख
लभेत्कन्याशतं दिव्यं व्रह्मलोकं च गच्छति ||  १६५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति