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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
शीलेन हि त्रय़ो लोकाः शक्या जेतुं न संशय़ः |  १५   क
न हि किञ्चिदसाध्यं वै लोके शीलवतां भवेत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति