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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
आत्मनस्तु ततः श्रेय़ो भार्गवात्सुमहाय़शाः |  २४   क
ज्ञानमागमय़त्प्रीत्या पुनः स परमद्युतिः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति