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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
भार्गवस्त्वाह धर्मज्ञः प्रह्रादस्य महात्मनः |  २६   क
ज्ञानमस्ति विशेषेण ततो हृष्टश्च सोऽभवत् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति