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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
व्राह्मणोऽपि यथान्याय़ं गुरुवृत्तिमनुत्तमाम् |  ३१   क
चकार सर्वभावेन यद्वत्स मनसेच्छति ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति