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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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भीष्म उवाच
निर्विद्य हि नरः कामान्निय़म्य सुखमेधते |  ७   क
त्यक्त्वा प्रीतिं च शोकं च लव्ध्वाप्रीतिमय़ं वसु ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति