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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
शक्रश्च पृष्ठतस्तस्य याति राजञ्श्रिय़ा वृतः |  १९   क
सह राजर्षिभिः सर्वैः स्तुवानो वृषकेतनम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति