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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
ततः प्रीतश्च दैत्येन्द्रो भय़ं चास्याभवन्महत् |  ४२   क
वरे प्रदिष्टे विप्रेण नाल्पतेजाय़मित्युत ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति