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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
दत्ते वरे गते विप्रे चिन्तासीन्महती ततः |  ४४   क
प्रह्रादस्य महाराज निश्चय़ं न च जग्मिवान् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति