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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिन्द्विजवरे राजन्वत्स्याम्यहमनिन्दितम् |  ४७   क
योऽसौ शिष्यत्वमागम्य त्वय़ि नित्यं समाहितः |  ४७   ख
इत्युक्त्वान्तर्हितं तद्वै शक्रं चान्वविशत्प्रभो ||  ४७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति