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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिंस्तेजसि याते तु तादृग्रूपस्ततोऽपरः |  ४८   क
शरीरान्निःसृतस्तस्य को भवानिति चाव्रवीत् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति