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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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भीष्म उवाच
इन्द्रप्रस्थे महाराज तव सभ्रातृकस्य ह |  ५   क
सभाय़ां चावहसनं तत्सर्वं शृणु भारत ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति