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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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धृतराष्ट्र उवाच
ततो भय़ं प्रादुरासीत्प्रह्रादस्य महात्मनः |  ५६   क
अपृच्छत च तां भूय़ः क्व यासि कमलालय़े ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति