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शान्ति पर्व
अध्याय ३३४
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वैशम्पाय़न उवाच
स हि परमगुरुर्भुवनपति; र्धरणिधरः शमनिय़मनिधिः |  १३   क
श्रुतिविनय़निधिर्द्विजपरमहित; स्तव भवतु गतिर्हरिरमरहितः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति