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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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श्रीरु उवाच
शीलेन हि त्वय़ा लोकाः सर्वे धर्मज्ञ निर्जिताः |  ५९   क
तद्विज्ञाय़ महेन्द्रेण तव शीलं हृतं प्रभो ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति