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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
नाददानं सन्दधानं विकर्षन्तं धनुर्न च |  ६१   क
पश्यामस्त्वा महावाहो रथे सूर्यमिव स्थितम् ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति