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अनुशासन पर्व
अध्याय १२४
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भीष्म उवाच
नोत्थापय़ामि भर्तारं सुखसुप्तमहं सदा |  १८   क
आतुरेष्वपि कार्येषु तेन तुष्यति मे मनः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति