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वन पर्व
अध्याय १२४
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लोमश उवाच
आभ्यामर्थाय़ सोमं त्वं ग्रहीष्यसि यदि स्वय़म् |  १५   क
वज्रं ते प्रहरिष्यामि घोररूपमनुत्तमम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति