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सभा पर्व
अध्याय ६१
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विदुर उवाच
एवं वै परमं धर्मं श्रुत्वा सर्वे सभासदः |  ८०   क
यथाप्रश्नं तु कृष्णाय़ा मन्यध्वं तत्र किं परम् ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति