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उद्योग पर्व
अध्याय १२४
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वैशम्पाय़न उवाच
घुष्यतां राजधानीषु सर्वसम्पन्महीक्षिताम् |  १८   क
पृथिवी भ्रातृभावेन भुज्यतां विज्वरो भव ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति