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द्रोण पर्व
अध्याय १२४
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सञ्जय़ उवाच
तव कोपाग्निना दग्धः पापो राजा जय़द्रथः |  २०   क
उदीर्णं चापि सुमहद्धार्तराष्ट्रवलं रणे ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति