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द्रोण पर्व
अध्याय १२४
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सञ्जय़ उवाच
त्वां हि चक्षुर्हणं वीरं कोपय़ित्वा सुय़ोधनः |  २२   क
समित्रवन्धुः समरे प्राणांस्त्यक्ष्यति दुर्मतिः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति