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द्रोण पर्व
अध्याय १२४
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सञ्जय़ उवाच
तौ दृष्ट्व मुदितौ वीरौ प्राञ्जली चाग्रतः स्थितौ |  २८   क
अभ्यनन्दत कौन्तेय़स्तावुभौ भीमसात्यकी ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति