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द्रोण पर्व
अध्याय १२४
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सञ्जय़ उवाच
कृष्ण दिष्ट्या मम प्रीतिर्महती प्रतिपादिता |  ४   क
दिष्ट्या शत्रुगणाश्चैव निमग्नाः शोकसागरे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति