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आदि पर्व
अध्याय १२५
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वैशम्पाय़न उवाच
कुरुराजे च रङ्गस्थे भीमे च वलिनां वरे |  १   क
पक्षपातकृतस्नेहः स द्विधेवाभवज्जनः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति