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शान्ति पर्व
अध्याय ३२६
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वैतदाख्यानवरं धर्मराड्जनमेजय़ |  १२१   क
भ्रातरश्चास्य ते सर्वे नाराय़णपराभवन् ||  १२१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति