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आदि पर्व
अध्याय १२५
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्समुदिते रङ्गे कथञ्चित्पर्यवस्थिते |  १८   क
दर्शय़ामास वीभत्सुराचार्यादस्त्रलाघवम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति