आदि पर्व  अध्याय १२५

वैशम्पाय़न उवाच

द्वारदेशात्समुद्भूतो माहात्म्य वलसूचकः |  २७   क
वज्रनिष्पेषसदृशः शुश्रुवे भुजनिस्वनः ||  २७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति