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आदि पर्व
अध्याय १२५
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वैशम्पाय़न उवाच
काञ्चनं कवचं विभ्रत्प्रत्यदृश्यत फल्गुनः |  ९   क
सार्कः सेन्द्राय़ुधतडित्ससन्ध्य इव तोय़दः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति