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द्रोण पर्व
अध्याय १५३
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सञ्जय़ उवाच
तौ भिन्नगात्रौ प्रस्वेदं सुस्रुवाते जनाधिप |  ३०   क
रुधिरं च महाकाय़ावभिवृष्टाविवाचलौ ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति