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शान्ति पर्व
अध्याय ३०४
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याज्ञवल्क्य उवाच
मनस्तथैवाहङ्कारे प्रतिष्ठाप्य नराधिप |  १५   क
अहङ्कारं तथा वुद्धौ वुद्धिं च प्रकृतावपि ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति