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शान्ति पर्व
अध्याय १२५
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भीष्म उवाच
आशावान्पुरुषो यः स्यादन्तरिक्षमथापि वा |  ३१   क
किं नु ज्याय़स्तरं लोके महत्त्वात्प्रतिभाति वः |  ३१   ख
एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रोतुं किमिह दुर्लभम् ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति