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अनुशासन पर्व
अध्याय १२५
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युधिष्ठिर उवाच
साम्ना वापि प्रदाने वा ज्याय़ः किं भवतो मतम् |  १   क
प्रव्रूहि भरतश्रेष्ठ यदत्र व्यतिरिच्यते ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति