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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
देवगुह्यमिदं प्रीत्या मय़ा वः कथितं महत् |  १४   क
भवन्तो हि श्रुतधनास्तपसा दग्धकिल्विषाः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति