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वन पर्व
अध्याय १२५
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लोमश उवाच
शृङ्गाणि त्रीणि पुण्याणि त्रीणि प्रस्रवणानि च |  १५   क
सर्वाण्यनुपरिक्रम्य यथाकाममुपस्पृश ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति