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उद्योग पर्व
अध्याय १२५
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वैशम्पाय़न उवाच
मुख्यश्चैवैष नो धर्मः क्षत्रिय़ाणां जनार्दन |  १६   क
यच्छय़ीमहि सङ्ग्रामे शरतल्पगता वय़म् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति