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उद्योग पर्व
अध्याय १२५
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वैशम्पाय़न उवाच
अचिन्तय़न्कञ्चिदन्यं यावज्जीवं तथाचरेत् |  २१   क
एष धर्मः क्षत्रिय़ाणां मतमेतच्च मे सदा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति