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भीष्म पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
शपे माधव सख्येन सत्येन सुकृतेन च |  ६८   क
अन्तं यथा गमिष्यामि शत्रूणां शत्रुकर्शन ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति