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उद्योग पर्व
अध्याय १२५
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वैशम्पाय़न उवाच
यद्यदेय़ं पुरा दत्तं राज्यं परवतो मम |  २४   क
अज्ञानाद्वा भय़ाद्वापि मय़ि वाले जनार्दन ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति