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द्रोण पर्व
अध्याय १२५
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दुर्योधन उवाच
अपरश्चापि दुर्धर्षः शिष्यस्ते सव्यसाचिना |  १२   क
अक्षौहिणीः सप्त हत्वा हतो राजा जय़द्रथः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति