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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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कृप उवाच
न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सर्वतोऽव्रुवन् |  १२१   क
तथैव चार्जुनो वाहादवरुह्यैनमाद्रवत् ||  १२१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति