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द्रोण पर्व
अध्याय १२५
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दुर्योधन उवाच
कथं पतितवृत्तस्य पृथिवी सुहृदां द्रुहः |  १७   क
विवरं नाशकद्दातुं मम पार्थिवसंसदि ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति