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वन पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
स चापि तानभ्यवदत्प्रसन्नः; सहैव तैर्भ्रातृभिर्धर्मराजः |  ६   क
तस्थौ च तत्राधिपतिर्महात्मा; दृष्ट्वा जनौघं कुरुजाङ्गलानाम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति