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द्रोण पर्व
अध्याय १२५
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दुर्योधन उवाच
अतो विनिहताः सर्वे येऽस्मज्जय़चिकीर्षवः |  २८   क
कर्णमेव तु पश्यामि सम्प्रत्यस्मज्जय़ैषिणम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति